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नवरात्रि — उत्सव का आध्यात्मिक पहलु

अध्यात्म पथ पर प्रगतिशील साधकों के लिए नवरात्रि के त्यौहार की अनुपम महिमा है। संपूर्ण वर्ष दरमियान आती ‘शिवरात्रि’ साधक के लिए साधना में प्रवेश करने का काल है तो ‘नवरात्रि’ उत्सवपूर्ण नवीनीकरण के अवसर की नौ रात्रियाँ हैं। नवरात्रि का यह त्यौहार शरद मास (September-October) और चैत्र मास (March-April) के आरंभ में मनाया जाता है। उत्सव की यह नौ रात्रियाँ, प्रकृति की मनुष्य को वह भेंट है, जब मनुष्य अपने भीतर रही मलिनता को पहचान कर हटाने का उद्यम करता है। परिणाम स्वरूप मनुष्य के भीतर इन नव-रात्रियों में नव-निर्माण का आध्यात्मिक कार्य गतिशील होता है।

नवरात्रि उत्सव की प्रासंगिकता

वैदिक विज्ञान के अनुसार यह सृष्टि एक चक्रीय-धारा में चल रही है, किसी सीधी रेखा में नहीं। प्रकृति के द्वारा हर वस्तु का नवीनीकरण हो रहा है। हर रात्रि के बाद दिवस है तो दिवस के बाद रात्रि। हर पतझड़ के बाद बसंत आती है तो बसंत के बाद पतझड़ निश्चित है। यहाँ जन्म और मृत्यु भी चक्राकार में है और सुख के बाद दुःख तो दुःख के पश्चात् सुख भी निश्चित चल रहा है। प्रकृति की स्थूल से सूक्ष्म तक की सभी रचनाएँ पुरातन से नवीन और नवीन से पुरातन के चक्रीय मार्ग (Circular route) का ही अनुशरण कर रही है। नवरात्रि का त्यौहार भी मनुष्य के मन (Mind) व बुद्धि (Intellect) को संसार की दौड़ में से लौट कर स्वयं में खोने का निश्चित सुअवसर है।

नवरात्रि उत्सव के चार मूलभूत साधन

संसार में भटकते चित्त को स्वयं के स्तोत्र तक वापिस लौटने के लिए मौन, प्रार्थना, सत्संग और ध्यान के मूलभूत आधार चाहिए। मौन हमारे मन की भटकन को दूर करता है तो प्रार्थना से यही मन ईश्वर में एकाग्र होने की चेष्टा करता है। सत्संग में ईश्वर के स्वरुप का सही निर्णय होता है और साधना का संपूर्ण मार्ग श्री गुरु सत्संग के माध्यम से ही उजागर करते हैं। तत-पश्चात् ध्यान की सम्यक् विधियों के द्वारा मनुष्य अपने मूल स्तोत्र (सत्-चित्त-आनंद) की ओर गमन करते हुए परम-रहस्य का साक्षात्कार करता है।

नवरात्रि उत्सव — एक आंतरिक यात्रा है

नवरात्रि का यह उत्सव मनुष्य के भीतर आंतरिक यात्रा कर के, नवीनीकरण को प्रकट करने का उत्सव है। यह समस्त ब्रह्माण्ड एक ही शक्ति से उत्पन्न हुआ है, संचालित हो रहा है और उस एक ही शक्ति में विलय को प्राप्त होगा। इसी शक्ति को हम ‘आद्य शक्ति’ कहते हैं। इस शक्ति को असंख्य नाम-रूपों से गाया और पूजा गया है। कोई इसे मात्र ‘देवी’ कहता है तो कोई ‘शक्ति’। कोई देवी और शक्ति को दुर्गा, काली, सरस्वती, लक्ष्मी, गौरी आदि के नाम और विविध रूप से पूजता है। परंतु हर मान्यता देवी को ‘माँ’ मानती है क्योंकि समस्त जड़ व चेतन पदार्थों की उत्पत्ति इस एक ही शक्ति में से हुई है और महा-विलय के पश्चात् सब कुछ इस एक शक्ति में ही खो जाता है।

नवरात्रि का उत्सव इस एक शक्ति, आद्य शक्ति को उजागर करने का सुअवसर है। वैसे तो यह शक्ति इस ब्रह्माण्ड के कण-कण में सक्रिय है परंतु मनुष्य इस महा-रहस्य से अपरिचित है क्योंकि तमस-रजस-सत्त्व गुणों की त्रिगुणात्मकता में ही मनुष्य का मन उलझा हुआ है।

तमस-रजस-सत्त्व का शुद्धिकरण

नवरात्रि के यह नौ दिन हमारे मन में रहे इन तीन गुणों का शुद्धिकरण करने के दिन हैं। तमस-रजस-सत्त्व से गुंथी हुई मनुष्य की प्रकृति अज्ञानता और मोह के कारण परिभ्रमण में उलझी हुई है। इन नौ- दिनों में क्रमशः इन तीन प्रकृतियों में शुद्धिकरण कर के मनुष्य के भीतर नव-निर्माण की संभावना को दृढ़ करना है।

प्रथम तीन दिवस — तमस का विसर्जन

धर्म संस्कृति में नवरात्रि उत्सव के प्रथम तीन दिवस ‘देवी दुर्गा माँ’ की पूजा होती है। अध्यात्म संस्कृति में इन प्रतीकों का महत्व होने से ‘देवी दुर्गा माँ’ के रहस्य को समझ कर अपने भीतर शुद्धि करने के यह तीन दिवस हैं। ‘दुर्ग’ का अर्थ होता है पहाड़, पर्वत, शैल। मनुष्य के भीतर पहाड़ जैसा ही अहंकार, अज्ञान और आसक्ति का भण्डार पड़ा है। प्रथम तीन दिवस में मौन-प्रार्थना-सत्संग व ध्यान के चतुर्विध आयाम से मन के भीतर पड़े इस ‘तमस’ को जान कर इससे मुक्त होने की ‘आद्य-शक्ति’ को प्रार्थना करनी है। साथ ही साथ अध्यात्म पथ पर हम सद्गुरू व उनके बताए मार्ग के प्रति पर्वत की तरह अकंप श्रद्धा व निष्ठा से भरे रहे — ऐसी भाव-समृद्ध याचना करनी है।

“ प्रार्थना का यह अटूट नियम है कि जब हम जान बूझ कर किए हुए दोषों से मुक्त होने की याचना करते हैं तो अनजाने में हुए विस्मृत दोषों से भी मुक्त हो जाते हैं।”

द्वितीय तीन दिवस — रजस में विवेक पूर्ण प्रवृति

चौथी-पाँचवी-छठी नवरात्रि में परंपराएँ ‘देवी लक्ष्मी माँ’ की पूजा करती हैं। अध्यात्म संस्कृति में यह ‘रजस’ का प्रतीक है। देवी लक्ष्मी धन का प्रतीकात्मक चित्रण है और मनुष्य जीवन चार प्रकार के धन से संपन्न है। यह धन ज्ञान, समय, शक्ति और संपत्ति के रूप में होता है। नवरात्रि के इन तीन दिनों में मौन-प्रार्थना-सत्संग व ध्यान के माध्यम से अपने जीवन को इन चार प्रकार के धन से समृद्ध करने की याचना हम ‘आद्य शक्ति’ से करते हैं। साथ-ही-साथ इन चार प्रकार की लक्ष्मी का हम विवेक पूर्वक उपयोग कर पाएं ऐसी विनती हम अनंत शक्ति पुंज से करते हैं।

‘देवी लक्ष्मी माँ’ से कुछ इस प्रकार से प्रार्थना होती है –
हे दिव्य आद्य शक्ति! इस मनुष्य जीवन में
ज्ञान का उपयोग स्वयं को जानने में हो,
संसार को जानने मात्र में नहीं।
समय का उपयोग वर्तमान में रहने के लिए हो,
भूत-भविष्य में भटकने के लिए नहीं।
शक्ति का उपयोग दूसरों को धर्म में प्रवृत करने के लिए हो,
अधर्म प्रवृति में सहायक होने के लिए नहीं।
संपत्ति का उपयोग शुभ स्थान व शुभ कारणों में हो,
अशुभ स्थान व कारण में नहीं ।

अंतिम तीन दिवस — सत्त्व में प्रवृत्ति व वृद्धि

इस उत्सव के अंतिम तीन दिवस ‘देवी सरस्वती माँ’ की पूजा होती है जो अध्यात्म संस्कृति में ‘सत्त्व’ का प्रतीक है। सत्त्व यानि मनुष्य के भीतर वह शुभ गुणों का प्रवाह जो उसे शुद्ध अस्तित्व की ओर सतत बहाता जाए।

जब शुभ करना और सोचना मनुष्य की बुद्धि का चुनाव नहीं उसका स्वभाव बन जाए तब सत्त्व प्रकृति में प्रवृति हुई ऐसा माना जाता है। इसी प्रकृति से हम ईश्वर की परा-अनुभूति में प्रवेश कर सकते हैं। तो अंतिम तीन दिवस में हमारे भीतर सत्त्व में प्रवृति, वृद्धि और परा की अनुभूति की प्रार्थना ‘आद्य शक्ति’ से होनी चाहिए।

विजय दशमी — तमस-रजस-सत्त्व पर विजय

जब इस प्रकार से नवरात्रि के नौ-दिनों में संपूर्ण निष्ठा और समर्पण के साथ तमस का विसर्जन होता है, रजस में विवेकपूर्ण प्रवृति होती है और सत्त्व की शुद्धि व वृद्धि होती है तब अंत में विजय-दशमी (दशहरा) का त्यौहार मनाया जाता है। यह उत्सव शुभ की अशुभ पर विजय और शाश्वत की क्षणिक पर विजय का प्रतीक है।

इस प्रकार प्रतीकों और प्रतीक- चिन्हों में गुंथी हमारी संस्कृति हर उत्सव को अनंत शक्ति की शाश्वत सत्ता से जोड़ती है। परंतु अज्ञान व अहंकार की आड़ में, सांसारिक विलास और भौतिक सुख तक ही हमने इन उत्सवों को सीमित कर दिया है। आओ, नवरात्रि के इस दिव्य उत्सव से स्वयं में नवीनीकरण की संभावनाओं को उजागर करें …

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