Samadhan PrakashSri Guru's Notes

समाधान प्रकाश — भाग 6

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समाधान प्रकाश के इस संकलन से साधकों के भीतर अपने प्रश्नों के समाधान प्राप्त करने का उत्साह मुझे प्रसन्नता से भर रहा है। SRM के चार आधार में से प्रथम आधार ‘प्रेम’ पर पिछली बार हम ने समाधान पाया। अत्यंत सामान्य रूप से प्रेम शब्द का उपयोग करने के कारण हम प्रेम के वास्तविक पहलू को ही भूल गए हैं, परंतु गतांक में आए समाधान से सभी ने ‘प्रेम’ के आध्यात्मिक अर्थ को स्पष्टता से ग्रहण किया है। मिशन के चार आधार — प्रेम, सेवा, संयम, साधना — व्यवहारिक स्तर पर इतने उपयुक्त किए गए हैं कि इनके आध्यात्मिक अर्थ को स्पष्ट करना अनिवार्य हो गया है। समाधान प्रकाश के इस संकलन में सेवा के पारमार्थिक रहस्य को उजागर कर रहे हैं। इसे पढ़ कर आप सेवा का यथार्थ स्वरूप समझ पाएँ – यही मंगल भावना।

— श्री गुरु

१. मिशन का दूसरा आधार-स्तंभ सेवा क्यों है?

प्रश्न: प्रेम से भरने के पश्चात् सेवा तो स्वाभाविक रूप से होती है। तो भी ‘सेवा’ को अलग से SRM का दूसरा आधार क्यों कहा है?

समाधान: आवश्यक तो यही है कि प्रेम का आंतरिक गुण सेवा की अभिव्यक्ति से प्रकट हो। परंतु सामान्य रूप से लोगों में यह अवलोकन ही नहीं होता जिससे कि वह देख पाएँ कि क्या हमारा प्रेम सेवा में परिवर्तित हुआ। मिशन गीत में हम गाते हैं – ‘आरंभ हो जब प्रेम से तो सेवा झलके जीवन में’ अर्थात् हमारे जीवन में प्रेम गुण उजागर हुआ है कि नहीं इसका निश्चय ही तभी होगा जब हमारे आचरण में ‘सेवा’ झलके। प्रेम वैचारिक क्रांति है तो सेवा आचरण के स्तर पर इस क्रांति के होने का प्रमाण है। विचार के स्तर पर हम चाहे कितना भी कहें कि अब हम आध्यात्मिक प्रेम से भरे हैं, परंतु जब तक विचार आचरण में नहीं उतरता तब तक उसकी कोई भी उपयोगिता नहीं है। इसलिए एक ओर SRM के प्रथम आधार ‘प्रेम’ से विचार-परिवर्तन कर के oneness के भावों को उजागर करना है, तो दूसरी ओर ‘सेवा’ से अपने विचारों को दैनिक जीवन में प्रयोग में लाना है। तभी हम समग्र विकास के मार्ग पर आगे बढ़ सकते हैं।


२. सेवा में मूलभूत भाव क्या होना चाहिए?

प्रश्न: सेवा तो एक शारीरिक कर्म होता है, तो इसे करते हुए हमारा मूलभूत भाव क्या होना चाहिए?

समाधान: सेवा करते समय हमारा मूलभूत भाव ‘लौटाने’ का होना चाहिए, कुछ ‘पाने’ का नहीं। यही अध्यात्म की अलौकिकता है। संप्रदायों में जब सेवा करने की प्रवृत्ति होती है तब नए शुभ कर्मों के बंध का प्रलोभन दिया जाता है कि सेवा से ऐसे कर्म बँधेंगे जिससे आगे चल कर अनुकूल परिस्थितियाँ मिलती हैं। इसमें ‘लोभ-कषाय’ सम्मिलित हो जाता है जो साधक को संसार परिभ्रमण में ही उलझाए रखता है। इससे एकदम विपरीत अध्यात्म की मान्यता है। हम कहते हैं कि सेवा का समय पूर्व कर्मों के उदय का समय है जिसे हमें सही दृष्टिकोण और भाव से करना है; सेवा करने का अवसर हमारी ही पूर्व की कोई file है जिसे कर के हमें उस कर्म-योग को खत्म करना है। जब हम इस समझ के साथ सेवा करते हैं तो इसमें कुछ पाने का भाव नहीं होता, परंतु लौटा कर ऋण-मुक्त होने का भाव होता है। यह भाव साधक को आंतरिक विकास के मार्ग पर सहजता के साथ अग्रसर करता है।


३. सेवा में उठते अहंकार से कैसे आज़ाद हों?

प्रश्न: सेवा करते हुए कितनी ही बार हमें ऐसे भाव आते हैं कि यदि हम न होते तो इनकी सेवा कौन करता? ऐसा सोच कर भीतर अहंकार का पोषण होने लगता है। उस समय हम स्वयं को इस भाव से कैसे आज़ाद करें?

समाधान: सेवा का मूलभूत भाव ही यही होना चाहिए कि हमने पूर्व में इनसे किसी प्रकार की सेवा ली थी जिसे अब प्रेमपूर्वक लौटा कर इस file को हम बंद कर रहे हैं। जब इस मूलभूत धारणा के साथ सेवा होती है तो अहंकार के बदले धन्यवाद का भाव ही उभरता है। हमारी खोई हुई वस्तु जब कोई हमें लौटाने आता है तो हम उसे ‘thank you’ कहते हैं, चाहे वह वस्तु हमारी ही थी। इसी प्रकार सेवा का अवसर आना अर्थात् हमारी सेवा की file ले कर वह व्यक्ति हमारे पास आया है – अब अहंकार करना उचित है या धन्यवाद का भाव रखना – इसका विचार करें।


४. सेवा में उठते द्वेष से कैसे बाहर आएँ?

प्रश्न: पूरे भाव से सेवा करने के पश्चात् भी जब कोई हमारे कृत्य से नाराज़ ही रहता है तो स्वाभाविक रूप से उसके प्रति द्वेष का भाव आता है। हम सेवा तो कर लेते हैं परंतु उसमें प्रेम का भाव नहीं रहता, उल्टा द्वेष हो जाता है। ऐसे में हमें क्या करना चाहिए?

समाधान: स्मरण में रहे कि सेवा का केंद्रबिंदु हम स्वयं हैं, दूसरे नहीं। यही अध्यात्म का मूलभूत रहस्य है क्योंकि हम जो कुछ भी कर रहे हैं उसका प्रथम प्रभाव हम पर ही पड़ता है। जब सेवा हमारी अपनी file है तो उसमें हमें अब कैसे pages डालने हैं यह सोचना है। दूसरे अपनी file में कैसे pages डाल रहे हैं यह उनका कार्य है, हमारा नहीं। उनकी नाराज़गी उनकी file पर प्रभाव डालेगी, परंतु हमारा द्वेष हमारी file को भारी करेगा। इन विचारों को अपने भीतर दृढ़ करने के लिए समय और समझ दोनों चाहिए जो सत्समागम से ही मिलते हैं। जब तक सेवा का प्रामाणिक भाव भीतर से नहीं आता तब तक यदि हम सेवा भी नहीं करेंगें तो हमारा आंतरिक विकास का प्रमाण कैसे होगा। सेवा में उठते हुए द्वेष को हटाना है, सेवा को नहीं। जब तक यथार्थ प्रेम का भाव विकसित नहीं होता तब तक सेवा के अवसर को नहीं छोड़ना और अपने भीतर की समझ को विकसित करते रहना है। सही समझ धीरे-धीरे द्वेष की गाँठों को ढीला करती है, जिससे उचित समय आने पर अवश्य ही स्वयं के भीतर से वह गाँठ खुल जाती है।


५. दैनिक जीवन में सेवा करना किसे कहते हैं?

प्रश्न: कोई यदि बीमार हो तो उसकी सेवा करी जाए परंतु ऐसा तो कभी-कभी ही होता है। ऐसे में, दैनिक जीवन में सेवा करना किसे कहते हैं?

समाधान: यह एक बहुत महत्वपूर्ण विचार है। दैनिक जीवन में अपने प्रत्येक कर्मों को सेवा के भाव से करना यही सेवा है। अर्थात् यदि कोई स्त्री घर के काम करती है तो उसे ‘काम’ शब्द के बदले ‘सेवा’ शब्द का उपयोग करना चाहिए; कोई व्यापार करके संपत्ति-संचय का कार्य करता है तो उसे इसे अपनी सेवा माननी चाहिए। ऐसा करने से मन के भावों में विनम्रता आती है, बुद्धि में विवेक प्रकट होता है कि सभी कुछ पूर्व कर्मों के आधीन है ऐसा निश्चय प्रगाढ़ होता है। ऐसी भाव दशा में कर्म-सत्ता में नए कर्म नहीं बँधते, क्योंकि साधक प्रत्येक कर्म को अपने पूर्व की file (कर्मोदय) के रूप में जान रहा है। साथ-ही-साथ जब हम किसी कर्म में सेवा का भाव डालते हैं तो लौटाने की यात्रा आरम्भ हो जाती है। हम वही लौटा पाते हैं जो हमारी कर्म-सत्ता में संग्रहित है इसलिए सेवा-भाव से किया हुआ कृत्य हमारी कर्म-सत्ता को हल्का करता है। परिणाम स्वरूप, साधक जीव कर्म-बँध के अवरोधों से स्वयं को आज़ाद होता महसूस करता है।


६. क्या क्रोध आदि भावों से करी हुई सेवा भी सेवा ही है?

प्रश्न: दैनिक कार्य में सभी कुछ सेवा है ऐसा मानना क्या संभव हो सकता है? हम कितनी ही बार कार्य करते हुए क्रोधित हो जाते हैं, कितनी ही बार झूठ बोल देते हैं, कितनी ही बार आलस्य से भर जाते हैं – तो क्या इन सभी दुर्गुणों के साथ किए हुए कर्मों को भी हम सेवा कह सकते हैं?

समाधान: सेवा हमारे दृष्टिकोण का परिवर्तन है। जन्मोंजन्म से लोभ-भाव से भर के करी हुई सेवा ने परिभ्रमण ही बढ़ाया है। इसलिए, सबसे पहले, सेवा में दृष्टिकोण का परिवर्तन होना चाहिए। इसके पश्चात् अवगुण छेदन और उसके पश्चात् गुण-प्राकट्य – इस प्रकार से क्रम होता है। कभी-कभी किसी व्यक्ति के साथ हमारे ऋणानुबंध ही ऐसे होते हैं कि यथार्थ दृष्टिकोण के साथ करी हुई सेवा के पश्चात् भी उसके साथ के संबंध में कोमलता नहीं आ पाती है। इस समय में साधक को ‘अवगुण-छेदन’ के पुरुषार्थ की जागृति रखनी होती है जिससे उस व्यक्ति के प्रति द्वेष- नफरत-पक्षपात आदि न हो। इससे आगे बढ़ते हुए साधक गुण-प्राकट्य के स्तर पर आता है, परंतु यह तभी सम्भव है जब साधना के माध्यम से उसके अंतःकरण में शुद्धि हुई हो। अंतस शुद्धि के पश्चात् अब विपरीत ऋणानुबंधी के प्रति की सेवा में भी साधक में शुभ भाव की ही प्रमुखता रहती है।


७. क्या सेवा से संबंधों में परिवर्तन होता है?

प्रश्न: क्या सेवा करने से हमारे अशुभ ऋणानुबंध शुभ संबंधों में परिवर्तित हो जाते हैं?

समाधान: इसकी भी कामना नहीं रखनी क्योंकि यह भी लोभ के आधीन करी हुई सेवा होगी। हाँ, ब्रह्माण्ड की व्यवस्था ही कुछ ऐसी है कि यथार्थ भाव से करी हुई सेवा से अशुभ कर्म कटते हैं और अशुभ कर्मों के कटने से जीव की पात्रता का निर्माण होता है। पात्रता-पूर्वक करी हुई साधना से स्वरूप का बोध उजागर होता है। यह स्वरूप-बोध प्रकट होने के पश्चात् हमारा किसी से भी वैर का संबंध नहीं रह पाता। यह निर्वैरता इस जन्म में भी उदय में आ सकती है और दूसरे भव में भी, परंतु नियम अटल है। साधक के लिए वर्तमान में होते स्वयं के भाव ही सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं और यदि उसमें सेवा का यथार्थ भाव रहता है तो भविष्य का परिणाम सुख-रूप ही होता है – ऐसा समझें।


८. क्या सेवा के बिना साधना नहीं होती?

प्रश्न: क्या सेवा के इस दृष्टिकोण के बिना कोई साधना में नहीं जा सकता?

समाधान: नहीं, यह सम्भव ही नहीं है कि इस दृष्टिकोण के बिना कोई सीधा साधना में उतर जाए। साधना अर्थात एक ऐसी यौगिक प्रक्रिया जिससे पसार हो कर साधक जीव स्वयं की सनातन सत्ता का अनुभव करता है। जब तक जीव स्थूल और बाह्य स्तर पर ‘लौटाने’ के भाव से नहीं भरता, तब तक सूक्ष्म व आंतरिक स्तर पर भी ‘लौटने’ का कार्य आरंभ नहीं हो पाता है। जब साधक जीव ज्ञात जगत में ही अपने भावों को दृढ़ नहीं कर पाता तो फिर अज्ञात जगत में कैसे स्थिर रह पाएगा..! अध्यात्म की संपूर्ण यात्रा ही है स्वयं की मान्यता को बदल कर आचरण को परिशुद्ध करने की और जब समग्र ओर से (व्यवहार और विचार के स्तर पर) शुद्धि होती है तभी साधक साधना में टिक पाता है – यह सिद्धांत है। अध्यात्म के इस मार्ग में कोई भी short-cut नहीं है क्योंकि यदि इन चार में से एक भी आधार को अनदेखा किया जाए तो साधक के भीतर समग्र विकास नहीं होता। हाँ, यह हो सकता है कि साधना के काल में सेवा का कृत्य गौण हो जाए परंतु दृष्टिकोण तो अटल रहता है।


इन प्रश्नों के समाधान पढ़ते हुए यह स्वाभाविक है कि साधक के मन में कुछ नए प्रश्नों का जन्म हो। ऐसे में हम आपको अपने प्रश्न यहाँ लिखने के लिए आमंत्रित करते हैं। आपके परमार्थ संबंधित प्रश्नों का समाधान श्री गुरु से प्राप्त हो सकता है। समाधान प्रकाश के आगामी संकलन में कुछ प्रश्नों के समाधान प्रकाशित किए जाएँगें।


समाधान प्रकाश श्रृंखला के पिछले ब्लॉग यहाँ पढ़ें:
भाग 1 | भाग 2 | भाग 3 | भाग 4 | भाग 5
ऐसे ही कुछ प्रश्नों के समाधान विस्तार से पढ़ें “समाधान” किताब में। यहाँ पाएँ »

Bliss of Wisdom is a blog for seekers who are in search of their true self. It is published by Shrimad Rajchandra Mission Delhi – a spiritual revolutionary movement founded by Sri Guru. She is a spiritual Master who has transformed innumerable lives through her logical explanations and effective meditation techniques. To know more, visit srmdelhi.org.

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11 Comments

  1. Thank you so much Prabhu sewa Ka Sahi arth hame samjhne k liye 🙏🌹🙇

  2. Seva aur Kartaya me kya difference hay ?

  3. Every aspect of sewa is cleared by this blog. Thank you so much Sri Guru for giving such a clarity .

  4. Jai krupadu Prabhu.. Thankyou so much for giving such a awesome clarity on sewa🙏🏼

  5. Jai Krupalu Prabhu
    Thank you very much for explaining the true meaning of Sewa. Today I realized how can I convert my day to day activities in to Sewa and avoid the burden of KARTABHAV .

  6. Thank you so much SRI GURU for explaining and giving so much Clarity of Seva ,I feel every vachan of Pratyaksh SRI GURU should be our agnya and we will love more and more and ultimately will convert into Nishkaam Seva ,where there will be no dwesh ,and all 4 kashays ,
    Gratitude and Immense Love ❤️ 🌹 🙏

  7. this was really needed… Seva aaj tak me ek karta bhav samaz rahi thi… Khud ko centre banake Seva Karna is a new view point I got from samadhan prakash

  8. Living in a family, first three are possible.

    But Sadhana remain untouched in the family.Hence please guide us Prabhuji.Jay Krupadu Gurudev.

  9. ખુબ ખુબ આભાર શ્રી ગુરુ . દિલ થી કોઈ પણ કામ કર્યા પછી પણ સામાં પક્ષ થી નીંદા જ મળે તો મન પર ભાર રહેતો હતો પણ આજે સેવા નો આટલો સરસ અર્થ સમજાવી મન હળવુ થઈ ગયું.Thank you very much sri guru કોટિ કોટિ વંદન.

  10. Pl.guide us how i can get Guru Diksha from living at Nagpur.Still I have not made any Guru.As a jain ,I am going to each Saint as avilable .I am doing SAMAI/Bhaktamer every day.Is it sufficient to travel Bhavesagar.I am regular listing your SATSANG .

    1. Please connect with SRM Helpline at connect@srmdelhi.com or 7098888388

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