Sri Guru's Notes

संपूर्ण-मनुष्य — पश्चिम व पूर्व का मिलन

पिछले छः वर्षों से पश्चिम की भूमि पर जा कर अपने धर्म संबंधित सूझाव को प्रस्तुत करने का एक अनमोल अवसर जीवन से मिल रहा है। यह अवसर मुझे मेरी धर्म-मान्यता में सुदृढ़ कर रहे हैं और साथ ही साथ धर्म-अनुभव की प्रचुरता भी प्रगाढ़ हो रही है। वर्ष 2013 से 2018 तक के इन वर्षों में कितने ही लोगों के जीवन पर अध्यात्म की अमिट छाप पड़ी है और उनके जीवन की दिशा दृश्य जगत से अदृश्य जगत के अनुभव उजागर करने की ओर मुड़ी है। स्वयं में विश्वास है कि स्वर्णिम युग के आने से पूर्व पृथ्वी में कुछ इसी प्रकार की आध्यात्मिक क्रांति आती है जो धर्म को परंपराओं की रूढ़ी चुस्त ज़ंजीरों से आज़ाद कर के परम का अनंत आकाश उघाड़ती है। इस blog में वर्ष 2018 की इस धर्म यात्रा के अंतर्गत मेरे कुछ निजी विचारों के प्रमुख अंश अंकित करती हूँ …

Sri Guru at Sufism Reoriented — San Francisco, CA, USA

1. पश्चिम की नैतिकता और पूर्व की आध्यात्मिकता का जब मिलान होगा तो एक पूर्ण मनुष्य के निर्माण का कार्य आरम्भ होगा।

सच में ही पश्चिम जगत के मनुष्य के कार्य-कौशल, उनकी कर्म-निष्ठता और उनके स्वच्छ वातावरण में आध्यात्मिकता के अनमोल बीज बड़ी ही सहजता से डाले जा सकते हैं। वहाँ की संस्कृति और कार्य-प्रणाली में मनुष्य कई प्रकार की अनैतिकता व अप्रामाणिकता से आज़ाद है। जहाँ एक ओर भारत में लोगों में ‘झूठ नहीं बोलना, चोरी नहीं करनी’ आदि के मूलभूत सिद्धांतों को भी पूरी तरह से स्थापित नहीं किया जा सका वहाँ उनमें आध्यात्मिकता के सूत्रों की समझ जागृत करना काफ़ी दुर्लभ कार्य दिखता है। SRM के अंतर्गत होते धारवाही सत्संगों में जहाँ एक ओर अध्यात्म के परम संदेश उजागर हो रहे हैं वहीं दूसरी ओर जीवन की मूल नीतियों पर प्रश्नचिन्ह लगा है और मनुष्य की प्रामाणिकता पर सदा संदेह बना ही रहता है। पूर्व का मनुष्य अध्यात्म संस्कृति का वारिस है तो पश्चिम का मनुष्य अध्यात्म के मूलभूत आधार-स्तम्भ नैतिकता और प्रामाणिकता का जीवंत उदाहरण है।

2. गुरु परम्परा के अभाव में गुरु की महिमा गहन है।

इस वर्ष की धर्म यात्रा में हर-एक दिन यह महसूस किया कि पूर्व का मनुष्य गुरु की मौजूदगी से ऊब गया है! वास्तविक सद्गुरू तो बरसों-बरसों में कभी कभी एक बार इस धरा पर आता है परंतु सद्गुरू के भेष में कुगुरु, पाखण्डी, पंडित और आकर्षक व्यक्तित्व के धनी ने हर ओर अपना साम्राज्य बना रखा है। उनका यह साम्राज्य यहाँ के मनुष्यों में रही अंध-श्रद्धा, वहम और अवैज्ञानिक दृष्टिकोण के कारण चल रहा है। परंतु पश्चिम के धर्म-प्रेमी समाज में यह व्यथा नहीं है। एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अंतर्गत उनके अंध विश्वास और भ्रम काफ़ी कम मात्रा में दिखते हैं जो अध्यात्म के लिए अति अनूकूल भूमिका है। प्रत्यक्ष सद्गुरू के अभाव में सद्गुरू के प्रति अत्यंत बहुमान से भरे हैं पश्चिम के मनुष्य परंतु पूर्व में मनुष्य गुरु-महिमा को नकारता जा रहा है।

3. पश्चिम का मनुष्य कुछ दाँव पर लगाना जानता है।

कुगुरुओं से बार बार धोखा खाने के कारण व अपनी आश्रय-बुद्धि के कारण पूर्व का मनुष्य गुरु की बात से चाहे कितना भी सम्मत क्यों न हो परंतु अपना कुछ भी दाँव पर लगा कर अपनी सुरक्षा के संकुचित दायरे से बाहर आना नहीं चाहता। परंतु पश्चिम का मनुष्य इससे एकदम विपरीत है। अध्यात्म यात्रा में अनंत की अनुभूति के लिए सीमाओं को दाँव पर लगाना अनिवार्य है जो क्षमता मैं पश्चिम के मनुष्य में कई अधिक मात्रा में देखती हूँ।

Satsang in Cleveland, OH, USA

4. पूर्व का मनुष्य दार्शनिक है परंतु पश्चिम का मनुष्य विचारक है।

अध्यात्म — एक वैचारिक क्रांति है, दार्शनिक क्रांति नहीं। परंपरा में जब भी दार्शनिक क्रांति होती है तब एक नया संप्रदाय जन्म लेता है और जब मनुष्य के भीतर वैचारिक क्रांति उठती है तो सनातन सत्य का अनावरण होता है। भारत में अनेक दर्शनों की मौजूदगी के कारण हर दर्शन के भेद-प्रभेद में मनुष्य उलझा हुआ है परंतु पश्चिम में सांप्रदायिकता की नयूनता के कारण मनुष्य सद्गुरू के वचन का विचार कर के जीवन के दिव्य आयाम का अनुभव करने के लिए तैयार है। शब्दों और मान्यताओं में उलझ कर कभी भी किसी ने सत्य को नहीं पाया परंतु पूर्व का मनुष्य इन्हीं मान्यताओं में उलझने को धर्म मानता जा रहा है। पूर्व में धर्म के नाम पर एक धोखा चल रहा है जो विचार-हीन मनुष्य स्वयं को ही दे रहा है और असद्गुरु इनका भरपूर फ़ायदा उठा रहें हैं।

5. पूर्व का मनुष्य आगामी जन्मों पर टालता है परंतु पश्चिम मानसिकता वर्तमान को ही जीना जानती है।

चाहे कोई भौतिक व्यसन से भरा आदमी हो या फिर कोई अत्यंत धर्म-निष्ठ मनुष्य — दोनों के अनुभव वर्तमान के सुख को ही मुख्यता देंगें। परंतु पूर्व के मनुष्य के भीतर की समझ कुछ ऐसी है कि यह तो जन्मोजन्म की शृंखला है। इस जन्म में स्वयं को जानने का कार्य नहीं हुआ तो अगले जन्म में कर लेंगें! यहाँ के मनुष्य को परम सुख की अनुभूति को अगले जन्म पर टालने की सुविधा है परंतु पश्चिम का मनुष्य इसी वर्तमान जीवन को सब कुछ मानता है जो अध्यात्म यात्रा के लिए अनिवार्य सोच है। अध्यात्म का मार्ग जन्मोजन्म पर टालने वालों का मार्ग ही नहीं है परंतु ‘अभी और यहीं’ का मार्ग है।

6. पश्चिम का मनुष्य खोज़ी है परंतु पूर्व की मानसिकता ‘मान लेने’ की है।

यही सबसे बड़ा अवरोध है भारतीय संस्कृति में। यहाँ का मनुष्य सोचे बिना, अनुभव किए बिना बस मान लेना चाहता है और ऐसे खोखले मानने को वह विश्वास, श्रद्धा कहता है।दिशाहीन विचारों से मनुष्य का मस्तिष्क ऐसा भरा हुआ है कि एक दिशा में समग्र विचार करने की क्षमता खो ही गयी है। बिना अनुभव के जब भी कोई मनुष्य मान लेगा तो उसका परिणाम मात्र इतना ही होगा कि अपनी मान्यता के विपरीत मान्यता के साथ विवाद होगा, विरोध होगा और विद्रोह होगा। यदि अनुभव के आधार पर मान्यता बनेगी तो विरोधी मान्यताओं का भी समन्वय हो जाता है परंतु किसी के कहने से जो जाना उसे मानना नहीं कहते। पश्चिम का मनुष्य स्व-विचार और अंतर-शोध के लिए तैयार है क्योंकि वह जानने और मानने के फ़र्क को बख़ूबी जानता है।

समन्वय चाहिए — नैतिकता और अध्यात्म का

मेरे इस आलेख से कोई भी ऐसा निष्कर्ष न निकाले कि पश्चिम का मनुष्य पूर्व के मनुष्य से अधिक योग्य है अध्यात्म अनुभूति के लिए। नहीं, हमें एक समन्वय चाहिए। पूर्विय संस्कृति आध्यात्मिक संस्कारों की धनी है और पाश्चात्य संस्कृति में नैतिकता, मौलिकता और विचारशीलता के अद्वित्य गुण है। यदि इन गुणों की आधारशिला पर अध्यात्म की अखंड अनुभूति की शोध आरम्भ की जाए तो मनुष्य अवश्य ही सफल होगा और ऐसे सफल मनुष्यों के सम्यक् प्रयास से यह धरती स्वर्णिम युग में स्वतः ही प्रवेश करेगी।

Sattva Retreat Seva Team with Sri Guru

पश्चिम जगत के मेरे सभी साधक साथियों को उनकी अनन्य प्रेम-श्रद्धा-विचारशीलता-तत्परता और अर्पणता के लिए हृदय से धन्यवाद भाव। गुणों की आधारशिला पर वह सभी गुणातीत की ओर यात्रा आरम्भ करें यही मंगल-भावना।

I truly know that without the support and surrender of seekers in that part of the world, it would have been very difficult for us to introduce our ideas of spirituality. I lovingly extend my heartfelt wishes for their accomplishment of pursuit of Eternal and Infinite.

Blessings!

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