Sri Guru's Notes

क्या जीवन में एक ही गुरु होना चाहिए?

प्रश्न : अध्यात्म के इस मार्ग पर प्रथम क़दम उठाने के लिए सद्गुरू का होना अनिवार्य है — ऐसा हम बचपन से सुनते आए हैं। मैंने बचपन में ही गुरु-धारणा करी थी परंतु अब मुझे आपके सत्संग से काफ़ी समझ आई है और मार्ग की स्पष्टता हुई है। वैसे मैं अपने गुरु की सभा में जा कर बैठूँ या आपके पास आऊँ — मुझे दोनों ही जगह समान अनुभव होते हैं। परंतु लोग कहते हैं कि गुरु तो एक ही होने चाहिए — अब मुझे दुविधा होती है कि मुझे क्या करना चाहिए। श्री बेन प्रभु, आप मेरा समाधान करें।

समाधान : अनंत की अनुभूति के लिए ‘गुरु’ द्वार है जिस द्वार से गुज़रे बिना कोई कभी भी अपने अस्तित्व में प्रवेश नहीं कर सकता। गुरु एक दशा है जिसमें प्रेम, करुणा, सरलता, निर्मलता आदि अनेक गुण सहज ही झलकते हैं। यह झलकना किसी व्यक्ति के अंदर होता है तो सामान्य रूप से हम उस व्यक्ति को ही गुरु मान लेते हैं और उसी विशेष व्यक्ति के आसपास हमारा धार्मिक समाज़ खड़ा हो जाता है।

तुम्हारी उलझन स्वाभाविक है। बचपन से गुरु का हाथ सर पर है परंतु जीवन स्तर को परम शुद्ध सत्ता से जोड़ने के लिए जो बातें हमारे सत्संग में होती है वह तुम्हें काफ़ी उपयोगी लगती है।अब यह दुविधा उठती है कि दो नावों पर कैसे सवार हुआ जाए?

सबसे पहले तो तुमने ठीक ही पहचाना कि दोनों गुरु की उपस्थिति में तुम्हें समान अनुभव होते हैं। यह तभी सम्भव है जब तुम गुरु में व्यक्ति नहीं दशा को देख पाते हो। धन्यवाद है तुम्हारी दृष्टि को ! निष्काम प्रेम, अकारण आनंद, शुद्ध सरलता के आंतरिक गुण जहाँ दिखते हैं वहाँ अनुभव भी समान ही होते हैं। अब बारी आती है चुनाव की — तो स्मरण रहे कि गुरु हमें चुनते हैं, हम गुरु को नहीं। यदि तुम्हें बचपन से यह सौभाग्य मिला है और तुम्हारा आंतरिक अनुभव भी ‘शुद्धि’ का है तो तुम्हें सम्पूर्ण समर्पण वहीं करना चाहिए।

यह समर्पण अनिवार्य है। तुम चाहते हो दोनों गुरु के समागम में आना परंतु यह उलझाता है और हमारे अज्ञान को और अधिक दृढ़ करता है।यहाँ हर गुरु अपने ज्ञान के उघाड़ और ईश्वर मिलन के निजी अनुभव के आधार पर कोई न कोई मार्ग का निर्माण करता है जिस पर चल कर साधक आंतरिक शुद्धि प्रकट करता हुआ ईश्वर अनुभव में सरकता है। जब आप भिन्न-भिन्न गुरु की सभा मैं जाएँगे तो आप स्वयं मार्ग का चुनाव आरम्भ कर देंगे। किसी की भक्ति तो किसी का ध्यान, किसी के नियम तो किसी का सत्संग। यह चुनाव ही साधक में गुरु के प्रति का असंदिग्ध समर्पण होने नहीं देता और स्वछंद की धारा चलती रहती है।

इसलिए, यह आवश्यक है कि ‘गुरु-तत्त्व’ का निर्णय हो जाने के पश्चात् वहीं समर्पणभाव के साथ मार्ग का अनुशरण करना चाहिए। किसी भी गुरु के प्रति कोई तिरस्कार का भाव नहीं हो परंतु अपने आत्मिक वैभव को प्रकट करने के लिए — एक गुरु के प्रति समर्पण अनिवार्य है।

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