Sri Guru's Notes

अपेक्षाओं पर कुछ विचार

प्रश्न : सत्संग हमें सिखाते हैं कि निष्काम बनो, किसी से कोई भी अपेक्षा मत रखो क्योंकि अपेक्षा ही दुःख का कारण है। परंतु रोज़िंदा जीवन में हम एकदम अपेक्षा-रहित कैसे जी सकते हैं यह बात ही समझ में नहीं आती। श्री बेन प्रभु, क्या इस तरह से अपेक्षा-रहित हो जाने से जीवन नीरस नहीं हो जाता? एक तरफ़ आप कहते हैं कि ‘धर्म यानी आनंद’ और दूसरी तरफ़ निष्काम होने से नीरसता आती है, तो यह संतुलन कैसे बने?

समाधान : तुम्हारी उलझन स्वाभाविक है और तुम्हारा प्रश्न उपयोगी है। पहले कुछ बातें स्पष्ट रहे — जब हम कहते हैं कि निष्काम बनो, इसका अर्थ यह होता है कि संसार की वस्तु-व्यक्ति-स्थिति आदि से सुख की अपेक्षा मत करो। तुम्हारा जो कर्तव्य कर्म है उसे करते चलो परंतु दूसरा कोई तुम्हारे कर्मों की सराहना करे, चर्चा करे, पुरस्कृत करे — तभी तुम सुखी होगे यह अपेक्षा गिरा दो। दूसरे कभी भी हमारी इच्छा के अनुसार नहीं जी सकते।

संसार की इसी रीत में रहकर हमें अध्यात्म की परम यात्रा आरम्भ करनी है। सभी धर्म शास्त्र एक मत से कहते हैं कि हमें कामना रहित होना होगा, इच्छा रहित होना होगा क्योंकि यह इच्छा ही आगामी जीवन के बीज हैं। लेकिन तुम्हारा प्रश्न भी स्वाभाविक है कि हम इच्छा रहित हो कैसे? मेरे अनुभव में इच्छा रहित होना, निष्काम होना एक यात्रा है जिसे क्रम से सम्पन्न की जा सकती है जो क्रम कुछ इस प्रकार से होता है –

1. अपेक्षाओं की व्याख्या करो (Define your expectations)

प्रायः ऐसा देखा गया है कि मनुष्य अपनी कामनाओं को लेकर स्पष्ट नहीं है। व्यक्ति को क्या चाहिए इसकी स्पष्टता जब उसे स्वयं नहीं होती तो कोई चाहे कितना भी उसके लिए करे परंतु भीतर प्रसन्नता नहीं आती। उदाहरण के लिए — हम restaurant में जाते हैं और uttapam मंगवाते हैं। जब साथ वाली table पर chowmein आती है तो हमें लगता है कि हमें भी chowmein मंगवानी चाहिए थी और हम परेशान हो जाते हैं। यह इसीलिए होता है क्योंकि हम स्वयं ही स्पष्ट नहीं है कि हमें क्या चाहिए।निष्काम होने की इस यात्रा में अनिवार्य है कि सबसे पहले हम स्वयं अपनी अपेक्षा से परिचित हों।

2. अपेक्षाओं की स्पष्ट अभिव्यक्ति करो (Express your expectations clearly)

मनुष्य की यह बहुत जटिल बीमारी रही है कि अधिकांश समय वह अपनी अपेक्षा को अभिव्यक्त ही नहीं करता। वह चाहता है कि दूसरा व्यक्ति स्वयं से समझ जाए कि हमें क्या पसंद है और वैसा करने लगे। परंतु यह सम्भव नहीं है। जब तक हम अपनी इच्छा को स्पष्ट रूप से कहेंगे नहीं तब तक सामने रहा कोई भी समझ ही नहीं सकता परंतु मनुष्य में रहा अभिमान उसे अपनी छोटी-छोटी इच्छाओं को भी व्यक्त करने से रोकता है। उदाहरण के लिए — यदि हमें जन्मदिन पर कुछ भेंट चाहिए तो हम चाहेंगे कि सामने वाला व्यक्ति स्वयं समझ ले, लेकिन यह कैसे सम्भव है? और इसी अनभिव्यक्ति (lack of expression) के कारण सम्बन्धों में दरार पड़नी शुरू हो जाती है। निष्काम होने के लिए आवश्यक है कि तुम अपनी अपेक्षाओं को स्पष्ट रूप से दूसरों को व्यक्त करो, कहो।

3. इच्छा की तर्क-संगतता का निश्चय करो (Be sure about the logicality of the desire)

जीवन की इस लीला में हर पात्र अपनी भूमिका निभा रहा है। करेला कड़वा ही होगा और नींबू खट्टा ही होगा। ईश्वर की रची इस सृष्टि में हर किसी का स्वभाव निश्चित ही है। यदि तुम रसगुल्ले से चटपटा स्वाद चाहोगे या भेल-पूरी से मीठा स्वाद चाहोगे तो तुम निश्चित ही दुखी रहोगे।इसी प्रकार हमारे सम्बन्धों में भी हमें सुनिश्चित होना चाहिए कि हम जिस व्यक्ति से जो अपेक्षा रख रहे हैं वह पूरी करने का उसका स्वभाव है भी कि नहीं? तुम बच्चे से अपने प्रति का आदर चाहो तो वह सिखाया जा सकता है परंतु तुम बच्चे से हर विषय में अव्वल आने को कहो तो यह उसके ज्ञानावरणीय कर्म के आधीन है, तुम्हारी इच्छा के आधीन नहीं।

4. स्वीकार करना सीखो (Learn Acceptance)

हमारे जीवन में सभी कुछ हमारी इच्छा के अनुसार नहीं होता। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि हम अपनी अपेक्षाओं में स्पष्ट हैं, तर्क-संगत भी हैं और अभिव्यक्त भी कर रहे हैं तो भी सामने वाले व्यक्ति में या परिस्थिति में कोई बदलाव ही नहीं आ रहा — अब फिर स्वीकार करना सीखो। अपनी अपेक्षाओं को स्पष्ट करने से पहले ही जो स्वीकार करने लग जाता है वह बहुत ही ऊपरी स्तर का स्वीकार है जो ऊपर से तो शांत दिखाएगा परंतु भीतर में तूफ़ान का सर्जन हो रहा होगा।

मन की आवश्यकता है तृप्ति — उसे अपनी कामनाओं की स्पष्ट अभिव्यक्ति करके पूरी करो तो भीतर असंतोष का भाव संग्रहित ही नहीं होगा। मन में रहे बड़े असंतोष बड़े पापों को आमंत्रण दे डालते हैं।

5. बदलाव की समानांतर अपेक्षा स्वयं से भी करो (Expect change in yourself parallely)

जहाँ हम एक ओर दूसरों से अपेक्षा रखते हैं, वहीं दूसरी ओर स्वयं में भी बदलाव की अपेक्षा रखनी चाहिए। कोई भी यहाँ सम्पूर्ण व श्रेष्ठतम नहीं है और हर किसी के जीवन का एक मात्र उद्देश्य अपनी वास्तविक पहचान को उजागर करना है। जीवन में कोई ऐसा निर्णायक पल ज़रूर हो जब से तुम स्वयं को बदलने का उद्यम करो क्योंकि बदलने की संभावना सदा ही अपने में हो सकती है, दूसरों में नहीं।

जब हम दूसरों को बदल कर सुखी होने की आकांक्षा करते हैं तो हमारा सुख व शांति दूसरों के आधीन हो जाता है और हम सदा ही उनके ग़ुलाम बने रहते हैं। परंतु जब हम बदलाव की आशा स्वयं से रखते हैं तो हम अपने जीवन के मालिक हो जाते हैं!

6. ईश्वरीय व्यवस्था पर श्रद्धा (Faith in Divivne Order)

यदि हम अपने जीवन में पीछे मुड़ कर देखेंगें तो यह देख पाएँगें कि हमारे द्वारा की गयी सभी इच्छाएँ सदा पूरी भी नहीं हुई और हमेशा नहीं-पूरी हुई हो ऐसा भी नहीं है। कुछ इच्छाएँ पूरी हुई और कुछ इच्छाएँ अपूर्ण भी रही हैं। जब हम शांति से घटनाओं के इस क्रम को देखते हैं तो पता चलता है कि कोई ईश्वरीय व्यवस्था ( या कर्म सिद्धांत) है जो इन इच्छाओं के पूर्ण-अपूर्ण रहने का हिसाब रखती है। कितनी ही बार यह अनुभव होता है कि वर्षों पहले हमने जो इतनी गहन इच्छा करी थी वह तब पूरी नहीं हुई तो अच्छा ही हुआ। यदि वह आकांक्षा पूरी होती तो आज हम जहाँ पर हैं वहाँ हरगिस नहीं होते। इससे यह सिद्ध होता है कि उस ईश्वरीय सत्ता को हमारे हित-अहित का सदा ही ज्ञान होता है।

अंत में इतना अवश्य कहूँगी कि कामनाओं का तूफ़ान, सैलाब आता ही तभी है जब हमारी छोटी छोटी इच्छाओं की पूर्ति नहीं हुई हो। इस अपूर्ति का गड्ढा इतना बड़ा हो जाता है कि अब और अधिक कामनाओं के तूफ़ान उठते हैं। साधक के जीवन में यह तूफ़ान ना उठे उसके लिए उसे आरम्भ से ही सावधान रहना होगा। छोटी-छोटी, तर्क-संगत अपेक्षाओं को स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त करके भीतर में गड्ढा होने ही नहीं दो, सम्बन्धों में मैत्री स्थापित करो और स्वयं के रूपांतरण की ओर क़दम उठाओ — इस प्रकार मनुष्य जीवन जीने का मज़ा भी आएगा और मोक्ष-पुरुषार्थ को वेग भी मिलेगा।

From the roots of expectations to the peak of unconditionality | Artwork dedicated by Parina Kamdar

Leave a reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Archives

अंतिम उपदेश

परम कृपालु देव श्रीमद् राजचंद्र जी विरचित इच्छत है जो जोगी जन, अनंत सुख स्वरूप।मूल ...
0 %