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रंगो का अध्यात्म

होली मात्र त्योहार न था, भीतर लौटने का आयोजन था

भारतीय अध्यात्म परंपरा में जीवन की उत्सवपूर्णता को सदा जागृत रखने के लिए त्योहारों का विशेष आयोजन किया गया है। मनुष्य का जीवन ईश्वरीय खोज की यात्रा पर निकलने के लिए एक उत्तम अवसर है और जब इस अवसर को उत्सवपूर्वक जीया जाए तो यात्रा सहज और सुगम हो जाती है।

Prahlada | Artwork dedicated by Parina Kamdar (©)

होली के दो प्रमुख पहलू

होली का त्योहार भी इसी परंपरा का एक अभिन्न अंग है जिसमें दो विशेष बोध के साथ जीवन जीने के आदर्श-सूत्र हैं। फाल्गुन (February-March) के मास में पूर्णिमा की रात्रि से एक रात पहले होलिका दहन का उत्सव मनाते हैं जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। हिरण्यकश्यप और प्रह्लाद की कथा के माध्यम से हमें यही बोध दिया जाता रहा है। मनुष्य जीवन में ही यह सम्भावना है कि हम अपने भीतर रही बुराइयों, कमियों, दोषों को देखें, समझे और उनकी व्यर्थता समझ कर उनसे मुक्त हों। अवलोकन की अग्नि में हम जैसे जैसे प्रवेश करते हैं वैसे वैसे हमारे भीतर के दोष उघड़ते हैं, उड़ते हैं, और अच्छाई प्रकटती है। होलिका दहन के सामूहिक उत्सव का भी यही प्रतीक है कि हमारे भीतर रही शुद्धि अब हमारी अशुद्धियों पर विजय प्राप्त करेगी।

होली के इस त्योहार का दूसरा पहलू भी उत्सव से भरपूर है। होलिका दहन में अच्छाई की जब बुराई पर जीत हो जाती है तो अग्नि के सन्मुख और अग्नि की साक्षी में साधक यह प्रतिज्ञा लेता है कि अच्छाई के इस रंग में अब हम सभी को रंगने की समग्र कोशिश करेंगें। मनुष्य जीवन का यही सर्वशास्त्रमान्य उद्देश्य है कि पहले स्वयं अपने भीतर शुद्धता प्रकटाना और फिर उस शुद्धि के रंग में सभी को रंगना। इसलिए होली के दिन हम सभी को रंग में रंगते हैं। यह सभी आयोजन प्रतीकात्मक है — चाहे दशहरा हो, दिवाली हो या होली हो — भारत की अध्यात्म परम्परा ईश्वर के रंग में रंगने की ही कोई न कोई उत्सवात्मक घोषणा है।

रंग में रंगने के आध्यात्मिक प्रतीक

परंपरा के अनुरूप होली में प्रमुख चार रंगों का ही उपयोग होता है जो अत्यंत प्रतीकात्मक है। लाल, पीला, हरा और नीला ये चार रंग अध्यात्म जगत में अच्छाई के चार आधारभूत सिद्धांतों के रंग हैं।

१. किसी को लाल रंग लगाने के पीछे हमारे मनीषियों का उद्देश्य यही था कि हम उस व्यक्ति को अभय का दान देते हैं। उस व्यक्ति को हमसे कोई भी संयोग में किसी भी प्रकार से डरने की आवश्यकता नहीं है।

२. पीला रंग सबके साथ स्नेह पूर्वक से वचन व्यवहार करने का प्रतीक है। मनुष्य का मनुष्य से सम्बंध वाणी के आधार पर ही बनता है और जब हमारी वाणी में मधुरता, मृदुता और मैत्री होगी तो सम्बन्धों में आत्मिक घनिष्टता बढ़ेगी। यह घनिष्टता मनुष्य को सामाजिक सलामती का अनुभव कराती है।

३. प्रकृति की भाँति, हरा रंग सबके प्रति निष्काम भाव से भरने का प्रतीक है। मनुष्य के जीवन में दूसरों से कामना, स्वार्थ का भाव ही स्वयं में दुःख की अनुभूति कराता है। हरा रंग प्रतीक है कि हम निस्वार्थ भाव से जीवन जीते हुए सभी के लिए उपयोगी होने का निर्णय करते हैं।

४. नीला रंग अनंत का प्रतीक है। जहाँ जहाँ सृष्टि में अनंतता के दर्शन होते हैं वहीं प्रकृति नीला रंग बिखेरती है। होली के त्योहार में भी नीला रंग हमें सबमें रहे अनंत ईश्वर की सत्ता की ओर दृष्टि कराता है। जीवन की सभी दुविधा ही इसलिए है क्योंकि हम व्यक्ति की अवस्थाओं में उलझ जाते हैं। इन अवस्थाओं का परम आधार तो सभी जन में एक ही है। होली के इस त्योहार के माध्यम से हम अस्तित्व की अनन्य एकता का उत्सव मनाते हैं।

उत्सव में आंतरिक प्रतिज्ञा

इस प्रकार होली का यह त्योहार छुट्टियाँ मनाकर, होलिका दहन करके, रंगों से खेलने मात्र का नहीं है। इन सब के साथ साथ आंतरिक रूपांतरण की प्रतिज्ञा करने का पर्व है। हमारी इस ऋषि परंपरा में ईश्वर-ऐक्य के लक्ष्य के बिना कोई भी त्योहार संपन्न ही नहीं होता। परंतु समय के गर्त में इन पर्वों के गहरे आंतरिक पहलू खो गए हैं और बाहरी आयोजन का विस्तार मात्र रह गया है।

होली के इस उत्सव का अंतर-बाह्य रूप को समझ कर इस त्योहार को न्यायपूर्ण रूप से हम सभी मनायें — यही इस पर्व का समग्र स्वरूप है।

गोपियाँ इस उत्सव को मनाती हुईं | Credit: wikipedia.org

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